हे कृष्ण!
हे कृष्ण! आप ही सबके मन की बात जानते हैं। हमारे मन में क्या चल रहा है, यह आपसे छिपा नहीं है।
हमें ऐसी शक्ति दीजिए कि हम कभी किसी की निंदा न करें और यदि कोई हमारी निंदा करे तो हम उससे दुखी न हों। हमें यह समझने की बुद्धि दें कि यदि कोई हमारी निंदा कर रहा है, तो वह किसी न किसी रूप में हमें याद भी कर रहा है। कई बार निंदा ही हमें ईश्वर और अध्यात्म के मार्ग की ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
हमें निंदा से नहीं डरना चाहिए, बल्कि सभी के साथ प्रेम, सौहार्द और करुणा के साथ रहना चाहिए। हमारा मन एक कोरे कागज के समान है; हम उसमें जैसे विचार लिखते हैं, हमारा जीवन भी वैसा ही बनता चला जाता है।
इसलिए हमें सदैव ईश्वर की भक्ति में तल्लीन रहना चाहिए, सभी के सुख-दुख में सहभागी बनना चाहिए और अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
हे प्रभु! हमें ऐसी भक्ति प्रदान करें कि हम सबकी प्रशंसा करें, सबके प्रति प्रेम और सम्मान का भाव रखें तथा अपने जीवन को सद्भाव, सेवा और भक्ति से भर दें।
॥ राधे कृष्ण ॥
? "निंदा से नहीं, अहंकार से डरना चाहिए; क्योंकि निंदा हमें ईश्वर के निकट और अहंकार हमें ईश्वर से दूर ले जाता है।" ?
डॉ गीतांजलि बौहरे
माधव शिक्षा महाविद्यालय
ग्वालियर
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