Apply For Dance competition
  • Download  
15-05-2026

मातृ दिवस: पूजा से संकल्प तक का सफर

                                                                                                                              

माँ—वह शब्द जिसमें पूरी सृष्टि समाई होती है। जिसके प्यार और दुलार से हर दर्द मीलों दूर चला जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में माँ का स्थान कोई और कभी नहीं ले पाता। व्यक्ति चाहकर भी माँ के स्नेह और दुलार के बदले में कोई दूसरा विकल्प माँ के बराबर खड़ा नहीं कर सकता।

यह भगवान का बनाया हुआ वह रूप है जिसका स्नेह, प्यार और दुलार पाने के लिए स्वयं ईश्वर ने कई बार धरती पर अवतार लिया है। ईश्वर की इस संपूर्ण प्रकृति को स्वयं में समेटे हुए माँ स्वयं के लिए एक सुकून का क्षण नहीं निकाल पाती। वह एक ऐसी धुरी है जिसके इर्द-गिर्द पूरा परिवार घूमता है, पर वह खुद को हमेशा अंत में रखती है।

एक विडम्बना और हमारा समाज बड़ी अजीब विडम्बना है कि सृष्टि में ईश्वर का रूप कहलाई जाने वाली रचना, जिसके लिए कहा जाता है कि जब ईश्वर हर जगह स्वयं नहीं पहुँच पाते तो उन्होंने माँ की रचना की, उसी सम्मान की मूरत माँ के नाम पर इस पुरुष प्रधान समाज ने गालियों का निर्माण कर डाला। धिक्कार है ऐसे लोगों पर जिन्होंने गालियाँ भी माँ-बहन के नाम पर बनाईं। हम एक तरफ मंदिर में देवी के सामने झुकते हैं और दूसरी तरफ सड़क पर या गुस्से में उसी 'स्त्री शक्ति' को अपशब्दों से अपमानित करते हैं। 10 मई 2026 को मातृ दिवस है। कई लोग इसे बड़े धूमधाम से मनाएंगे, सोशल मीडिया पर तस्वीरें लगाएंगे और उपहार देंगे। मातृ दिवस केवल साल में एक दिन सोशल मीडिया पर फोटो लगाने या शुभकामना देने का पर्व नहीं है। यह पर्व उस शक्ति के सम्मान का है जो एक जीवन को गढ़ती है। लेकिन आज जब हम स्कूल और कॉलेज के गलियारों में झांकते हैं, तो एक कड़वी सच्चाई सामने आती है। विद्यार्थियों के बीच आपसी संवाद में 'मां-बहन' की गालियां एक सामान्य बोलचाल का हिस्सा बन गई हैं। अत्यंत चिंताजनक यह है कि इस भाषाई गिरावट में अब केवल लड़के ही नहीं, बल्कि लड़कियां भी बराबरी से शामिल हैं। हम जो शब्द चुनते हैं, वे हमारे व्यक्तित्व और संस्कारों का प्रतिबिंब होते हैं। जब कोई विद्यार्थी दूसरे को नीचा दिखाने के लिए किसी की मां या बहन को अपशब्द कहता है, तो वह न केवल सामने वाले का अपमान करता है, बल्कि स्वयं के पालन-पोषण और गरिमा पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। जिस मां ने हमें बोलना सिखाया, यदि उसी की गरिमा को हम अपनी बोलचाल की गालियों में शामिल करते हैं, तो यह मातृ शक्ति का सबसे बड़ा अपमान है। वास्तविक मातृ दिवस उस दिन होगा जब:हर पुरुष हर विद्यार्थी यह संकल्प ले कि उसकी जिह्वा से किसी की मां या बहन के लिए अपशब्द नहीं निकलेंगे।युवा पीढ़ी यह समझे कि 'कूल' (Cool) दिखने के लिए गालियों का सहारा लेना आधुनिकता नहीं, बल्कि मानसिक दरिद्रता है। शिक्षकों और अभिभावकों को मिलकर एक ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जहाँ अभद्र भाषा के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance) की नीति हो। चरित्र निर्माण को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि समय की मांग है।

अगर हमें अपनी माँ को सच्ची श्रद्धांजली और सम्मान देना है, तो दिखावे से ऊपर उठना होगा। मातृ दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं वरन् माँ से ही हमारा अस्तित्व है 

माँ को उपहारों से ज्यादा आपके समय, आपकी विनम्रता और आपके सम्मान की आवश्यकता है।

हमारा संकल्प

यदि हम अपनी माँ के लिए वास्तव में कुछ करना चाहते हैं, तो आज यह प्रण लें कि:

*हम जीवन में कभी भी, किसी भी परिस्थिति में किसी के लिए भी 'माँ' की गाली का उच्चारण नहीं करेंगे।

*हम नारी के उस स्वरूप का सम्मान करेंगे जो केवल हमारे घर तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज में है।

*हम माँ को केवल एक दिन नहीं, बल्कि जीवन के हर दिन यह अहसास कराएंगे कि वह हमारे लिए अनमोल हैं।

याद रखिये, जिस मुख से हम 'माँ' कहकर पुकारते हैं, उसी मुख से माँ के नाम की गाली निकलना उस ममता का अपमान है जिसने हमें बोलना सिखाया। शिक्षा वही है जो हमें इंसान बनाए। हम अपने स्कूलों, कॉलेजों और समाज में एक ऐसी संस्कृति विकसित करेंगे जहाँ शब्दों में मर्यादा हो और व्यवहार में नारी शक्ति के प्रति वास्तविक सम्मान। याद रखें, एक शिक्षित समाज वही है जहाँ भाषा पवित्र हो और चरित्र अडिग। आइए, इस मातृ दिवस पर अपनी भाषा और अपनी सोच को शुद्ध करने का संकल्प लें। यही एक माँ के लिए सबसे बड़ा उपहार होगा।

                                   लेखिका: नीलम शर्मा   (माधव शिक्षा महाविद्यालय)